🌺 ललिता देवी की कथा -त्रिपुरा सुंदरी का दिव्य रहस्य
🕉️ भूमिका
भारतीय धर्मग्रंथों में अनेक देवियों की कथाएँ मिलती हैं, परंतु उनमें से एक देवी ऐसी हैं जिन्हें “सर्वश्रेष्ठ शक्ति स्वरूपा” कहा गया है — ललिता त्रिपुरा सुंदरी।
ब्रह्माण्ड पुराण और ललिता सहस्रनाम में उनका वर्णन इतना अद्भुत है कि वे सृष्टि, शक्ति और सौंदर्य – तीनों की जननी कही जाती हैं।
यह कथा बताती है कि कैसे देवी ललिता ने अधर्म का नाश कर धर्म की रक्षा की, और साथ ही माँ शक्ति के सर्वोत्कृष्ट रूप का दर्शन कराया।
🌸 कहानी की शुरुआत – ब्रह्मा, विष्णु और शिव का संवाद
एक बार ब्रह्मा, विष्णु और शिव त्रिकूट पर्वत पर एकत्र हुए। सृष्टि में असंतुलन फैल चुका था — भंडासुर नामक राक्षस ने सारे देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था।
भंडासुर कोई साधारण असुर नहीं था; उसे भगवान शिव के भस्म से उत्पन्न किया गया था, और उसी शक्ति के कारण वह अजेय बन गया था।
देवता भयभीत होकर बोले –
“हे भगवती! जब तक कोई अद्भुत शक्ति प्रकट नहीं होती, तब तक यह ब्रह्मांड अधर्म में डूब जाएगा।”
तभी एक दिव्य प्रकाश ब्रह्मांड में फैला और उसमें से एक तेजस्विनी स्त्री प्रकट हुई —
वह थीं ललिता त्रिपुरा सुंदरी, जो माँ शक्ति का पूर्ण रूप थीं।
🔥 ललिता देवी का दिव्य प्रकट होना
देवी का रूप अद्भुत था।
उनके तीन नेत्र सूर्य, चंद्र और अग्नि के समान चमक रहे थे।
उनका मुख कमल के समान कोमल और सुंदर था।
हाथों में वे पाश, अंकुश, धनुष और पुष्प बाण धारण किए थीं।
उनके साथ हजारों देवियाँ थीं, जो ललिता देवी की शक्तियाँ थीं।
सबसे प्रमुख थी — श्री राजराजेश्वरी, मन्त्रिणी मातंगि, और वराही देवी।
देवी ललिता ने जब ब्रह्मा, विष्णु और शिव को देखा, तो मुस्कराकर कहा –
“भंडासुर का नाश अब निश्चित है। धर्म का पुनर्स्थापन मेरे हाथों से होगा।”
⚔️ ललिता देवी की युद्ध तैयारी
देवी ने अपने लिए एक अद्भुत नगर प्रकट किया, जिसका नाम था श्रीपुरम — यह स्वर्णमयी त्रिपुर कहलाता है।
उस नगर के बीचोंबीच देवी ने श्रीचक्र स्थापित किया, जो शक्ति और ज्ञान का केंद्र है।
फिर देवी ने अपने वाहन — श्रीचक्ररथ (शक्ति का रथ) — पर आरूढ़ होकर युद्ध की घोषणा की।
उनके साथ 64 योगिनियाँ, 16 नित्य देवियाँ, और हजारों मातृकाएँ थीं।
भंडासुर की सेना ने जब देवी का रूप देखा, तो पूरा आकाश देवी के “जय जय ललिता माँ” के घोष से गूंज उठा।
⚡ भंडासुर और ललिता देवी का महान युद्ध
भंडासुर के दो शक्तिशाली पुत्र थे — विशंग और विशुक।
दोनों ने देवी की सेना पर आक्रमण किया, लेकिन देवी के मन्त्रिणी मातंगि और वराही देवी ने उन्हें युद्ध में परास्त कर दिया।
फिर स्वयं भंडासुर रथ पर सवार होकर आया और बोला –
“हे स्त्री! तू चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, मैं शिव की भस्म से जन्मा हूँ। मुझे कोई नाश नहीं कर सकता!”
देवी ने शांत भाव से उत्तर दिया –
“हे मूढ़! तू उसी शिव की भक्ति से विरक्त हुआ है, जिसने तुझे जन्म दिया। अब तेरा अंत निश्चित है।”
इसके बाद ललिता देवी ने अपना पुष्प बाण उठाया।
वह बाण पांच तत्वों से बना था — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश।
जब देवी ने उसे छोड़ा, तो पूरा आकाश बिजली की तरह चमक उठा।
भंडासुर का अंत उसी क्षण हो गया।
देवताओं ने “जय ललिता त्रिपुरा सुंदरी” के नारे लगाए, और स्वर्ग में फिर से शांति स्थापित हुई।
🌺 देवी का वरदान और ललिता सहस्रनाम की उत्पत्ति
युद्ध समाप्त होने के बाद देवी ने ब्रह्मा, विष्णु और शिव को दर्शन दिए।
उन्होंने कहा –
“मैं सृष्टि की आधार हूँ। जो भी मेरी भक्ति से ‘ललिता सहस्रनाम’ का पाठ करेगा, उसका जीवन आनंद और ज्ञान से भर जाएगा।”
फिर उन्होंने ललिता सहस्रनाम स्तोत्र का उपदेश भगवान हयग्रीव को दिया।
हयग्रीव ने यह ज्ञान अगस्त्य ऋषि को बताया, और अगस्त्य ने इसे संसार में फैलाया।
ललिता सहस्रनाम के प्रत्येक नाम में देवी की किसी न किसी शक्ति का रूप छिपा है।
जैसे –
“त्रिपुरा सुंदरी” – तीनों लोकों में सबसे सुंदर।
“राजराजेश्वरी” – सभी राजाओं की अधिष्ठात्री।
“कमलासन प्रिय” – ब्रह्मा की प्रिय।
“भंडासुर मर्दिनी” – भंडासुर का संहार करने वाली।
🌸 ललिता देवी का स्वरूप और दर्शन
देवी ललिता का वास्तविक स्वरूप त्रिपुरा सुंदरी है —
वह ज्ञान, शक्ति, और भक्ति का संगम हैं।
उनके पाँच मुख हैं —
1️⃣ पूर्व दिशा का मुख – भक्ति का प्रतीक
2️⃣ दक्षिण मुख – ज्ञान का प्रतीक
3️⃣ पश्चिम मुख – वैराग्य का प्रतीक
4️⃣ उत्तर मुख – ऐश्वर्य का प्रतीक
5️⃣ ऊपर का मुख – मोक्ष का प्रतीक
ललिता देवी को श्रीचक्र के केंद्र में पूजा जाता है।
यह श्रीविद्या साधना का हृदय है, जिसमें 43 त्रिकोण होते हैं — हर त्रिकोण में देवी की कोई न कोई शक्ति निवास करती है।
🪷 ललिता देवी और भक्तों के प्रति करुणा
ललिता देवी न केवल राक्षसों का नाश करती हैं, बल्कि अपने भक्तों की मनोकामना भी पूरी करती हैं।
कहते हैं, जो व्यक्ति नित्य “श्री ललिता सहस्रनाम” का पाठ करता है, उसे जीवन में भय, रोग और दुःख नहीं सताते।
भक्त अगस्त्य ऋषि ने कहा था —
“जिसने एक बार भी ‘जय ललिता माता’ कहा, वह जीवन के अंधकार से मुक्त हो जाता है।”
🌷 आध्यात्मिक अर्थ
ललिता देवी की कथा केवल युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि भक्ति और ज्ञान से ही अहंकार का नाश होता है।
भंडासुर हमारे अंदर का अहंकार है, जिसे ललिता माँ का प्रेम और कृपा मिटा देती है।
जब हम “ललिता सहस्रनाम” का जप करते हैं, तो हमारे भीतर की नकारात्मकता धीरे-धीरे समाप्त होती है, और आत्मा प्रकाशमय बन जाती है।
🕊️ निष्कर्ष – ललिता माँ का संदेश
ललिता देवी सिखाती हैं कि —
“शक्ति और सौंदर्य तब ही सार्थक हैं जब उनका उपयोग संसार के कल्याण में हो।”
वे माँ हैं — दयालु, करुणामयी और सर्वशक्तिमान।
उनकी कथा यह संदेश देती है कि जो सच्चे मन से माँ ललिता का स्मरण करता है, उसके जीवन में कभी अंधकार नहीं रहता।
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