: असुरों का आतंक और पार्वती की तपस्या
प्राचीन काल में, जब देवता और असुरों के बीच निरंतर संघर्ष होता था, तब एक असुर का नाम तीनों लोकों में आतंक का कारण बना – तारकासुर।
तारकासुर ने वर्षों तक कठोर तपस्या की और ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया।
ब्रह्मा जी ने कहा –
“वत्स! माँग क्या चाहता है?”
तारकासुर बोला –
“मुझे यह वरदान मिले कि मेरा वध केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों से हो।”
ब्रह्मा जी ने सोचा कि शिवजी गहन तपस्या में लीन हैं और विवाह की इच्छा नहीं रखते, इसलिए यह वरदान सुरक्षित है। उन्होंने तारकासुर को यही वरदान दे दिया।
वरदान पाकर तारकासुर ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। इंद्र का सिंहासन हिल गया, ऋषियों के यज्ञ बाधित होने लगे और धरती पर प्रजा दुखी हो उठी।
असुरों का साम्राज्य बढ़ता ही गया।
देवता घबराकर ब्रह्मा जी और विष्णु जी के पास पहुँचे। विष्णु जी ने कहा –
“इस संकट का निवारण केवल एक उपाय से संभव है। भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह होना आवश्यक है, क्योंकि वही पुत्र तारकासुर का अंत करेगा।”
पार्वती की कठोर साधना
हिमालय की पुत्री पार्वती बचपन से ही भगवान शिव को अपने मन का स्वामी मान चुकी थीं। जब देवताओं ने उन्हें स्थिति बताई, तो उन्होंने निश्चय किया कि वे शिवजी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करेंगी।
उन्होंने घने जंगल में जाकर कठोर तप आरंभ किया।
पहले हजारों वर्षों तक केवल फल और कंद-मूल खाए।
फिर कई वर्षों तक केवल जल पर जीवित रहीं।
अंत में बिना जल और अन्न के, धूप और अग्नि के बीच बैठकर ध्यान किया।
उनकी तपस्या इतनी कठोर थी कि देवता भी आश्चर्यचकित हो उठे।
अंततः शिवजी प्रसन्न हुए। उन्होंने पार्वती से कहा –
“हे देवी! तुम्हारी तपस्या ने मुझे वश में कर लिया है। मैं तुम्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करता हूँ।”
शिव-पार्वती विवाह
संपूर्ण देवताओं, ऋषियों और गंधर्वों की उपस्थिति में हिमालय पर भव्य विवाह सम्पन्न हुआ। यह विवाह केवल एक युगल का मिलन नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन की पुनः स्थापना थी।
विवाह के बाद देवताओं को विश्वास हुआ कि अब तारकासुर का अंत निकट है।
पार्ट 2 : कार्तिकेय का जन्म और देवसेना का गठन
विवाह उपरांत, माता पार्वती और भगवान शिव के तेज से एक दिव्य शक्ति उत्पन्न हुई।
उस तेज को गंगा और अग्नि देव ने अपने मार्ग से धारण किया। अंततः उस तेज से एक दिव्य बालक का जन्म हुआ
– कार्तिकेय (स्कन्द, मुरुगन, षण्मुख)।
कार्तिकेय अद्वितीय तेजस्वी बालक थे। उनके छह मुख थे और उनके चारों ओर दिव्य आभा फैली हुई थी।
देवताओं ने उन्हें देवसेना का सेनापति नियुक्त किया। सभी देवताओं ने मिलकर उन्हें दिव्य अस्त्र-शस्त्र दिए।
भगवान शिव ने उन्हें त्रिशूल प्रदान किया।
विष्णु जी ने चक्र दिया।
अग्नि देव ने वेल (भाला) भेंट किया, जो कार्तिकेय का प्रमुख शस्त्र बना।
इंद्र ने अपने ऐरावत हाथी और दिव्य रथ उन्हें सौंपा।
अब देवताओं की सेना संगठित हो चुकी थी और उसका नेतृत्व कार्तिकेय करने लगे।
देवासुर संग्राम की तैयारी
जब तारकासुर को पता चला कि शिव-पुत्र का जन्म हो चुका है, तो उसने और भी घमंड से देवताओं को चुनौती दी।
“अगर तुम्हारे पास सेनापति है, तो युद्ध में आओ। मैं देखता हूँ कौन मुझे परास्त करता है!”
देवताओं और असुरों के बीच भीषण युद्ध आरंभ हुआ।
असुरों की ओर से लाखों योद्धा, राक्षस और दैत्य उतरे।
देवताओं की ओर से इंद्र, वरुण, अग्नि, वायु, यम और अन्य देवता कार्तिकेय के नेतृत्व में खड़े हुए।
पहली भिड़ंत इतनी भयंकर थी कि तीनों लोक काँप उठे।
ब्रह्मांड में अंधकार छा गया और समुद्र उफान मारने लगे।
कार्तिकेय का शौर्य
कार्तिकेय ने अपने भाले (वेल) से असुरों की सेनाओं को चीरना शुरू किया। उनके छह मुखों से एक साथ मंत्रोच्चार निकल रहे थे और उनकी गति इतनी तीव्र थी कि कोई उन्हें रोक नहीं पा रहा था।
देवताओं ने पहली बार अनुभव किया कि तारकासुर का अंत अब संभव है।
लेकिन तारकासुर स्वयं अभी युद्धभूमि में नहीं उतरा था। वह जानता था कि उसकी शक्ति देवताओं से कहीं अधिक है।
पार्ट 3 : तारकासुर का वध और कार्तिकेय की महिमा
जब असुरों की सेना परास्त होने लगी, तब तारकासुर स्वयं युद्धभूमि में आया।
उसका रूप भयानक था – पर्वत जितना विशाल शरीर, आँखों से अग्नि निकल रही थी और हाथ में विशाल गदा।
उसने गर्जना करते हुए कहा –
“ओ छोटे बालक! तू सोचता है कि मुझे हरा देगा? मैं अमर हूँ, मुझे कोई देवता या असुर पराजित नहीं कर सकता।”
कार्तिकेय ने शांत भाव से उत्तर दिया –
“तारकासुर, तेरा अहंकार तेरा अंत है। तुझे वरदान मिला था कि केवल शिवपुत्र ही तुझे मार सकता है। और मैं वही हूँ। आज तेरी अधर्म की लीला समाप्त होगी।”
भीषण युद्ध
दोनों के बीच भयानक युद्ध आरंभ हुआ।
तारकासुर अपनी गदा से पर्वतों को चीर डालता।
कार्तिकेय अपने भाले से उसकी हर चोट को निष्फल कर देते।
कभी तारकासुर आकाश में छलाँग लगाता, कभी धरती हिलाता।
लेकिन कार्तिकेय की गति और शक्ति दिव्य थी।
घंटों तक युद्ध चलता रहा। अंत में कार्तिकेय ने ध्यानपूर्वक अपना वेल (भाला) उठाया और शिव का स्मरण करके पूरी शक्ति से तारकासुर के हृदय में प्रविष्ट कर दिया।
भाला लगते ही तारकासुर भूमि पर गिर पड़ा। उसकी दैत्य सेना भयभीत होकर भाग गई।
देवताओं ने “जय स्कन्द! जय कार्तिकेय!” के नारे लगाए।
कार्तिकेय की महिमा
तारकासुर के वध के बाद तीनों लोकों में शांति स्थापित हुई। देवताओं ने कार्तिकेय को प्रणाम किया और कहा –
“आपकी वीरता और भक्ति से ही अधर्म का अंत हुआ। आप सदैव देवसेना के सेनापति रहेंगे।”
भगवान शिव और माता पार्वती ने भी आशीर्वाद दिया –
“वत्स, तू सदा धर्म की रक्षा के लिए स्मरण किया जाएगा।”
✨ कहानी का संदेश
अहंकार और अधर्म चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसका अंत निश्चित है।
सच्ची भक्ति और तपस्या से असंभव भी संभव हो जाता है।
भगवान कार्तिकेय (स्कन्द) केवल युद्ध के देवता ही नहीं, बल्कि साहस और धर्म की रक्षा के प्रतीक हैं।
स्कन्द पुराण यह सिखाता है कि संतुलन और न्याय की स्थापना ईश्वर की इच्छा से ही होती है।
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