🌿 पृथु महाराज की कथा — विष्णु पुराण से
🔶 प्रस्तावना: एक राजा जिसने धरती को माँ कहा
भारत के प्राचीन ग्रंथों में ऐसे अनेक नायक मिलते हैं जिन्होंने धर्म, सत्य और करुणा के मार्ग से दुनिया को नई दिशा दी।
ऐसे ही एक महान राजा थे — महाराज पृथु।
वे केवल एक शासक नहीं, बल्कि “धरती के पिता” कहलाए।
आज भी “पृथ्वी” शब्द का नाम पृथु से ही आया है —
क्योंकि उन्होंने धरती को पुनः जीवन दिया था।
यह कहानी सिर्फ एक पुराणिक कथा नहीं, बल्कि यह बताती है कि
“सच्चा राजा वह होता है जो जनता के सुख को अपना धर्म समझे।”
🔶 वेन का अत्याचार और राज्य में अराजकता
बहुत समय पहले एक राजा था — वेन।
वह अत्यंत क्रूर, अभिमानी और अधर्मी था।
उसने देवताओं की पूजा बंद करवा दी, यज्ञ निषेध कर दिए और स्वयं को ही भगवान घोषित कर दिया।
धीरे-धीरे धरती पर अनर्थ फैल गया —
वर्षा रुक गई, फसलें सूख गईं, गायें दूध देना बंद कर दीं।
जनता दुखी हो उठी।
ऋषि-मुनियों ने सोचा — “अब धर्म की रक्षा करनी होगी।”
उन्होंने एकत्र होकर वेन को समझाया, परंतु वह न माना।
अंततः उन्होंने अपने तप से वेन का अंत कर दिया।
लेकिन अब एक नई समस्या खड़ी हुई —
राजा के बिना राज्य अराजक हो गया।
लोगों को शासन, सुरक्षा और न्याय की आवश्यकता थी।
🔶 पृथु का जन्म — वेन की देह से अवतार
ऋषियों ने अपने दिव्य ज्ञान से वेन की जड़ देह को शुद्ध किया।
उन्होंने उसमें से एक दिव्य पुरुष को उत्पन्न किया —
वह थे पृथु, विष्णु का अंशावतार।
जन्म से ही उनके शरीर में तेज झलकता था, जैसे सूर्य का प्रकाश।
जब वे बड़े हुए, तो उनके मुखमंडल पर करुणा और धर्म की ज्योति दिखने लगी।
ऋषियों ने कहा —
“यह बालक ही आने वाले युग में धर्म की स्थापना करेगा।”
पृथु के जन्म से धरती पर शांति की किरण लौट आई।
🔶 पृथु का राज्याभिषेक और प्रतिज्ञा
जब पृथु युवा हुए, तो ऋषियों ने उनका राजतिलक किया।
सारे देवता, ब्राह्मण, और लोग आनंदित हो उठे।
राज्याभिषेक के समय पृथु ने घोषणा की —
“मैं धरती का पालन करूंगा, जैसे पुत्र अपनी माँ की सेवा करता है।”
“मेरे लिए प्रजा का सुख ही सबसे बड़ा धर्म है।”
उनकी यह प्रतिज्ञा सुनकर देवताओं ने पुष्पवृष्टि की।
वायु मधुर हो चली, और धरती ने हरियाली ओढ़ ली।
🔶 पृथ्वी माता का रूठना और अनाज की कमी
परंतु तभी एक बड़ी समस्या सामने आई —
धरती (पृथ्वी देवी) ने अन्न उगाना बंद कर दिया।
लोग भूखे मरने लगे।
ऋषि, ब्राह्मण, किसान — सभी पीड़ित थे।
राजा पृथु ने देखा कि लोग दुख में डूबे हैं।
वे व्यथित हो उठे और बोले —
“मैं तब तक चैन नहीं लूंगा जब तक मेरी प्रजा सुखी न हो जाए।”
वे अपने दिव्य रथ पर सवार हुए और धरती का पीछा करने लगे।
धरती गाय के रूप में भागी — पर पृथु के संकल्प से वह बच नहीं सकी।
🔶 पृथ्वी माता और पृथु का संवाद
पृथ्वी देवी ने कहा —
“राजन्! तुम मुझ पर क्रोध क्यों कर रहे हो?
मैं तो जीवों को धारण करने वाली हूँ।”
पृथु बोले —
“माँ! जब तुम अन्न नहीं देती,
तब जीव कैसे जीवित रहेंगे?
क्या यह तुम्हारा धर्म नहीं कि तुम सबको पोषण दो?”
पृथ्वी बोली —
“राजन्, अधर्मी राजाओं और पापी मनुष्यों ने मेरी शक्ति का दुरुपयोग किया।
इसलिए मैंने अपनी शक्ति छिपा ली।”
पृथु ने विनम्रता से कहा —
“माँ, अब मैं धर्म स्थापित करूंगा।
तुम मेरे राज्य में बिना भय के रहो।
मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा और तुम्हें फिर से समृद्ध बनाऊंगा।”
यह सुनकर पृथ्वी प्रसन्न हो गईं।
उन्होंने कहा —
“हे पृथु! मैं तुम्हें अन्न, फल, औषधियाँ और खनिज दूँगी।
तुम मुझे हल चलाकर जोत सकते हो।”
🔶 हल चलाने की शुरुआत — कृषि का आरंभ
पृथु महाराज ने तब धरती को जोता —
और यही कृषि का आरंभ माना गया।
धरती से अनाज, फल, फूल और औषधियाँ उगने लगीं।
लोगों ने फिर से यज्ञ शुरू किए, देवताओं को प्रसन्न किया।
धरती ने अपना सारा वैभव लुटा दिया।
ऋषियों ने कहा —
“पृथ्वी अब पृथु के नाम से प्रसिद्ध होगी।”
इसीलिए आज हम अपनी धरती को “पृथ्वी माता” कहते हैं।
🔶 आदर्श शासन — राजा का धर्म
पृथु महाराज ने अपने शासन में कभी अन्याय नहीं होने दिया।
उन्होंने कर वसूली केवल उतनी ही की, जितनी जनता वहन कर सके।
वे रात में भेष बदलकर नगर में घूमते और लोगों के दुख-सुख पूछते।
उनका शासन “रामराज्य” की तरह था —
जहाँ कोई भूखा नहीं था,
कोई अन्याय नहीं था,
और कोई भयभीत नहीं था।
ऋषि और देवता भी उनकी प्रशंसा करते थे।
वह सच्चे अर्थों में “राजर्षि” थे —
राजा भी और ऋषि भी।
🔶 धर्मसभा और नीति उपदेश
एक दिन पृथु ने विशाल धर्मसभा बुलाई।
उन्होंने कहा —
“राजा का कर्तव्य केवल शासन नहीं,
बल्कि प्रजा के हर दुख को अपना बनाना है।”
उन्होंने युवराजों को समझाया —
“राज्य का सुख राजा की भक्ति में नहीं,
बल्कि प्रजा की सेवा में है।”
उन्होंने नीति दी —
“राजा को हमेशा ब्राह्मण, गरीब और गाय की रक्षा करनी चाहिए,
क्योंकि यही धर्म की तीन आधारशिलाएँ हैं।”
🔶 विष्णु भगवान का आशीर्वाद
भगवान विष्णु पृथु की तपस्या और न्याय देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए।
वे स्वयं उनके सामने प्रकट हुए और बोले —
“पृथु, तुम मेरे अंश से उत्पन्न हुए हो।
तुमने धर्म की रक्षा की है,
इसलिए तुम्हारा नाम सदा अमर रहेगा।”
भगवान ने उन्हें वरदान दिया —
“जब तक धरती रहेगी, तुम्हारा नाम उसके साथ रहेगा।
पृथ्वी तुम्हारे नाम से ही जानी जाएगी।”
देवताओं ने पुष्पवृष्टि की, और सम्पूर्ण लोकों में मंगल ध्वनि गूँज उठी।
🔶 पृथु का अंतिम उपदेश और ध्यान
जब वे वृद्ध हुए, तो उन्होंने राज्य अपने पुत्रों को सौंप दिया।
फिर वे वन में चले गए और भगवान विष्णु के ध्यान में लीन हो गए।
धीरे-धीरे उन्होंने अपने शरीर का त्याग कर दिया और विष्णुलोक को प्राप्त हुए।
उनके प्रस्थान के बाद भी उनके शासन की कीर्ति सदियों तक गूँजती रही।
लोग कहते —
“अगर राजा पृथु जैसा हो, तो धरती कभी सूनी नहीं रहती।”
🌺 पृथु महाराज की कथा का संदेश
राजा का कर्तव्य केवल शासन नहीं, बल्कि प्रजा की सेवा है।
धरती हमारी माँ है, उसका संरक्षण करना ही सच्चा धर्म है।
धर्म और कर्म दोनों जीवन को संतुलित रखते हैं।
अन्न उत्पादन और मेहनत का आदर करना चाहिए।
अहंकार नहीं, करुणा और सेवा भाव ही सच्ची शक्ति है।
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👉 पृथु महाराज की कथा — विष्णु पुराण से | पृथ्वी माता और कृषि की उत्पत्ति की कहानी
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👉 पढ़िए विष्णु पुराण की अद्भुत कहानी, जिसमें राजा पृथु ने धरती को माँ कहा और अन्न उत्पादन की शुरुआत की। यह कथा सिखाती है कि सच्चा राजा वही है जो अपनी प्रजा का पालन पुत्र की तरह करे।
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