त्रिकाल साधु और मृत्यु का द्वार
पार्ट 1 : शापित नगरी का रहस्य
प्राचीन काल में हिमालय की तलहटी में एक नगर बसा था – कालकुट नगर। बाहर से वह नगर साधारण लगता था, परंतु उसकी दीवारों के भीतर छिपा था ऐसा रहस्य जिसे जानने के बाद बड़े-बड़े ऋषि भी भय से कांप उठते।
कहा जाता था कि उस नगर में रात के समय कोई भी जीवित व्यक्ति सुरक्षित नहीं रह सकता। जैसे ही सूर्य अस्त होता, नगर की गलियों में अदृश्य छायाएँ घूमतीं, और सुबह होते-होते नगर से कोई न कोई व्यक्ति गायब मिल जाता। लोगों का विश्वास था कि यह नगर किसी त्रिकाल साधु के शाप से ग्रसित है।
कई शताब्दियाँ पहले, जब नगर समृद्ध और वैभवशाली था, तब वहाँ के राजा अजयपाल ने अपनी महत्वाकांक्षा में एक गंभीर भूल की थी। नगर में रहने वाले वृद्ध साधु, जिन्हें त्रिकालदर्शी माना जाता था, ने राजा को चेतावनी दी थी कि अहंकार में मत बहो, अन्यथा समस्त नगर विनाश को प्राप्त होगा। लेकिन राजा ने साधु का अपमान किया और उन्हें कारागार में डाल दिया।
कैद में साधु ने तीन रातें मौन तप किया और चौथी रात नगर के द्वार पर खड़े होकर यह शाप दिया –
“हे नृप! जिस नगर ने साधु का अपमान किया है, वहाँ सूर्यास्त के बाद मृत्यु ही नृत्य करेगी। जब तक कोई निष्कलुष आत्मा इस शाप को तोड़ेगी नहीं, यह नगर श्मशान की भाँति जीते-जागते प्रेतों का घर बना रहेगा।”
उसके बाद नगर में अकाल, महामारी और भयावह घटनाएँ घटित होने लगीं। धीरे-धीरे लोग वहाँ से पलायन कर गए, और जो बचे वे शाप की गिरफ्त में जीवन जीने लगे।
कहानी की नई शुरुआत
सैकड़ों वर्ष बाद, एक युवक अभय उस नगर के रहस्य की खोज में आया। अभय विद्वान और साहसी था, और उसका हृदय ईश्वर में अटूट विश्वास रखता था। उसके गुरु ने उसे बताया था कि यदि वह इस नगर के रहस्य को सुलझा ले, तो न केवल अनगिनत आत्माओं की मुक्ति होगी बल्कि वह स्वयं मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होगा।
अभय नगर में प्रवेश करता है।
चारों ओर टूटी-फूटी हवेलियाँ
हवा में अजीब-सी ठंडक
मंदिरों की घंटियाँ टूटी हुई
और बीचोंबीच खंडहर महल, जो कभी राजा अजयपाल का था।
दिन में नगर सामान्य दिखता है, पर जैसे-जैसे सूर्य पश्चिम की ओर ढलने लगता, वैसे-वैसे वातावरण भारी होने लगता। पक्षियों की चहचहाहट बंद हो गई। कुत्ते तक अजीब चीख निकाल भाग गए।
संध्या होते ही अभय ने देखा कि महल की टूटी खिड़कियों से एक नीली आभा निकल रही है। और तभी एक छायामूर्ति प्रकट हुई, जिसने गहरी आवाज़ में कहा –
“कौन है जो शापित नगर में कदम रखता है? यहाँ से लौट जा, वरना तेरी आत्मा भी इसी अंधकार का हिस्सा बन जाएगी।”
अभय ने हिम्मत बटोरी और कहा –
“मैं सत्य की खोज में आया हूँ। यदि यह नगर शापित है, तो मैं उस शाप को तोड़ने का प्रयास करूंगा।”
छायामूर्ति क्रोध में काँप उठी और अचानक नगर के श्मशान की ओर इशारा किया। वहाँ से असंख्य परछाइयाँ उठीं और अभय की ओर बढ़ने लगीं। लेकिन अभय ने अपने गुरु द्वारा दिया गया त्रिशूलाकार यंत्र निकाला और “ॐ नमः शिवाय” का उच्चारण किया।
क्षणभर में वातावरण बदल गया। परछाइयाँ पीछे हट गईं, मानो किसी अदृश्य शक्ति से बंध गई हों।
अभय ने मन ही मन निश्चय किया –
“यह नगर साधु के शाप से बंधा है। मुझे उस साधु की आत्मा तक पहुँचना होगा और शाप की जड़ को ढूँढना होगा।”
लेकिन वह नहीं जानता था कि यह मार्ग उसे न केवल मृतात्माओं की भूलभुलैया में ले जाएगा, बल्कि मृत्यु के द्वार तक खींच ले जाएगा…
👉 पार्ट 1 यहीं समाप्त होता है।
त्रिकाल साधु की आत्मा से सामना
पार्ट 2 (लगभग 1000 शब्द)
रात गहराने लगी थी। चाँद बादलों के पीछे छिपा हुआ था और नगर की गलियों में मानो किसी ने अंधकार की चादर बिछा दी हो। अभय धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ रहा था जहाँ से उसे नीली आभा दिखाई दी थी। उसका हृदय दृढ़ था, पर मन के किसी कोने में भय भी बार-बार दस्तक दे रहा था।
खंडहर महल का प्रवेश द्वार
अभय ने महल की टूटी-फूटी सीढ़ियाँ चढ़ीं। दरवाज़ा स्वयं खुल गया मानो उसे किसी ने भीतर बुलाया हो। भीतर घुप्प अंधेरा था, परंतु दीवारों पर जले-भुने दीपक अपने आप प्रज्वलित हो गए।
अभय को आश्चर्य हुआ। उसने देखा कि महल के मध्य में एक विशाल यज्ञकुंड था, पर उसमें राख के अलावा कुछ भी शेष नहीं था। अचानक हवा का एक तेज़ झोंका चला और यज्ञकुंड से नीली लौ उठी।
उस लौ से धीरे-धीरे एक आकृति बनी—वह था वही त्रिकाल साधु जिसकी कथा उसने सुनी थी।
लम्बी जटाएँ
तेजस्वी नेत्र
गले में रुद्राक्ष की माला
हाथ में खड़ाऊँ और एक जलता हुआ त्रिशूल
परंतु उनका चेहरा शांत नहीं था। उसमें क्रोध, पीड़ा और घृणा मिश्रित थी।
अभय और साधु का संवाद
साधु की आत्मा ने गहरी आवाज़ में कहा—
“हे युवक! तू यहाँ क्यों आया है? इस नगर को मैंने शापित किया था, और अब यहाँ मृत्यु का ही शासन है। लौट जा।”
अभय ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया—
“गुरुदेव! यदि आप साधु हैं तो करुणामूर्ति भी हैं। यह नगर निर्दोष आत्माओं का कारागार बन गया है। क्या धर्म यही सिखाता है कि सैकड़ों वर्षों तक जीवित और मृत आत्माएँ कष्ट भोगें? कृपा कर शाप का कारण बताइए।”
साधु की आँखें लाल हो गईं।
“यह नगर और इसका राजा अधर्म का प्रतीक था। उसने साधु का अपमान किया। अहंकार में डूबा वह राजा अपने प्रजा के लिए शत्रु बन गया था। मैंने उसे चेताया, पर उसने मेरी नहीं सुनी। तब मैंने यह शाप दिया कि यहाँ कभी शांति न बसे।”
अभय ने विनम्र स्वर में कहा—
“परंतु गुरुदेव, राजा तो बहुत पहले मर चुका है। अब यह नगर केवल मासूम आत्माओं की पीड़ा बनकर रह गया है। क्या आप नहीं चाहते कि वे मुक्त हों?”
साधु की आत्मा काँप उठी। उसकी आँखों से अग्नि जैसी आँसुओं की बूँदें टपकीं।
“मैं चाहता हूँ… पर शाप केवल शब्द नहीं होता, वह संकल्प होता है। इसे तोड़ने के लिए किसी को मृत्यु-द्वार तक जाना होगा और उस बंधन को काटना होगा। यह मार्ग किसी साधारण मनुष्य के लिए नहीं है।”
मृत्यु-द्वार का रहस्य
अभय ने साहस जुटाकर कहा—
“गुरुदेव, मैं तैयार हूँ। मुझे बताइए कि यह मृत्यु-द्वार कहाँ है।”
साधु ने त्रिशूल ज़मीन पर मारा। धरती फट गई और वहाँ से सीढ़ियाँ नीचे की ओर जाने लगीं। गहरी गर्जना हुई, मानो पृथ्वी के पेट से कोई अदृश्य राक्षस निकल रहा हो।
“यह वही मार्ग है जो मृत्यु-द्वार की ओर जाता है। वहाँ यमराज के प्रहरियों का वास है। केवल वही व्यक्ति सफल होगा जिसके हृदय में अहंकार का एक कण भी न हो और जिसकी आत्मा पूर्णत: पवित्र हो। अन्यथा उसका शरीर यहीं नष्ट हो जाएगा और आत्मा सदा के लिए भटकती रहेगी।”
अभय ने साधु के चरणों को प्रणाम किया और नीचे उतरने लगा।
भूलभुलैया का संसार
जैसे-जैसे वह सीढ़ियाँ उतरता गया, वातावरण बदलता गया।
पहले सीलन और ठंडी हवा
फिर अचानक धधकती गर्मी
और अंततः उसने स्वयं को एक भूलभुलैया जैसे स्थान में पाया, जहाँ चारों ओर अग्नि की दीवारें थीं।
हर मोड़ पर अजीब आकृतियाँ प्रकट होतीं—कभी आधे मानव, आधे पशु, कभी बिना सिर के प्रेत। वे सभी उसे रोकने का प्रयास करते।
पर अभय ने अपने गुरु की दी हुई माला थाम रखी थी। वह हर बार “ॐ त्र्यम्बकं यजामहे…” का जाप करता और आगे बढ़ जाता।
पहली परीक्षा – भय की अग्नि
अचानक उसके सामने एक विशाल अग्निकुंड प्रकट हुआ। उसमें से आवाज़ आई—
“यदि तू आगे बढ़ना चाहता है, तो अपने सबसे बड़े भय का सामना कर। अन्यथा यहीं भस्म हो जाएगा।”
अभय की आँखों के सामने उसकी माँ का चेहरा उभर आया, जो वर्षों पहले एक दुर्घटना में मर गई थी। उसके मन में अपराधबोध था कि वह उस समय माँ को बचा नहीं सका।
अग्नि में उसकी माँ की आकृति तड़प रही थी।
“बेटा! तू मुझे क्यों छोड़ आया?”
अभय का हृदय टूट गया, पर उसने आँखें मूँद लीं और कहा—
“माँ, मैं अपराधी नहीं, केवल दुर्बल था। पर आज मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि किसी आत्मा को व्यर्थ पीड़ा में नहीं छोड़ूँगा।”
ज्यों ही उसने यह कहा, अग्नि शांत हो गई और मार्ग खुल गया।
दूसरी परीक्षा – मोह का बंधन
आगे उसे सोने-चाँदी से सजी एक हवेली दिखी। उसमें सुंदर स्त्रियाँ वीणा बजा रही थीं और मधुर संगीत से उसे लुभा रही थीं।
आवाज़ आई—
“अभय, यही तेरा स्वर्ग है। क्यों तू मृत्यु-द्वार की कठिन राह चुन रहा है? यहीं रह, तुझे वैभव और सुख मिलेगा।”
क्षणभर के लिए उसका मन डगमगाया। पर तुरंत उसे अपने गुरु की वाणी याद आई—
“सच्चा साधक कभी लोभ और मोह में नहीं फँसता। उसका लक्ष्य केवल सत्य और मुक्ति होती है।”
अभय ने जोर से उच्चारण किया—
“ॐ नमः शिवाय!”
हवेली धुएँ में बदल गई और वह आगे बढ़ गया।
मृत्यु-द्वार की झलक
अंततः वह एक विशाल गुफा में पहुँचा। वहाँ दो भयंकर द्वारपाल खड़े थे—
काले शरीर
लाल नेत्र
हाथों में गदा
उन्होंने गरजकर कहा—
“मृत्यु-द्वार में केवल वही प्रवेश कर सकता है जो अपने अहंकार का वध कर चुका हो। हमें सिद्ध कर कि तू योग्य है।”
अभय ने हथियार उठाने की कोशिश की, पर तभी उसके भीतर से आवाज़ आई—
“असली शत्रु ये द्वारपाल नहीं, तेरे भीतर का अहंकार है।”
उसने हथियार फेंक दिए, हाथ जोड़कर आँखें बंद कीं और मन ही मन बोला—
“हे प्रभु, यदि मेरे भीतर अभी भी अहंकार का कण शेष है तो मुझे यहीं रोक दो। पर यदि मेरा मार्ग धर्म का है तो स्वयं मुझे शक्ति दो।”
क्षणभर में गुफा गूँज उठी। द्वारपालों ने अपने गदे झुका दिए और बोले—
“तू योग्य है। मृत्यु-द्वार तेरा स्वागत करता है।”
गुफा का द्वार धीरे-धीरे खुलने लगा। भीतर से अंधकार की आँधी और घंटों की गूंज उठी।
👉 पार्ट 2 यहीं समाप्त होता है।
पार्ट 3 : मृत्यु-द्वार का रहस्य और मुक्ति की जीत
मृत्यु-द्वार के भीतर
गुफा का द्वार धीरे-धीरे खुला। भीतर ऐसा अंधकार था जो केवल आँखों को ही नहीं, आत्मा को भी निगल लेने की शक्ति रखता था। अभय ने गहरी साँस ली और एक कदम भीतर रखा।
अचानक उसके चारों ओर झंकार की ध्वनि गूँज उठी। ऐसा लग रहा था मानो अनगिनत घड़ियाल, शंख और नगाड़े एक साथ बज उठे हों। फिर एक दिव्य सिंहासन प्रकट हुआ, जिस पर यमराज स्वयं विराजमान थे—
काले रंग का तेजस्वी शरीर
हाथ में दंड
सिर पर मुकुट
और पीछे विशाल भैंसा
उनकी आँखों की चमक देख अभय काँप गया, पर प्रणाम करते हुए बोला—
“प्रभु, मैं यहाँ नगर की आत्माओं को मुक्त कराने आया हूँ। मुझे मार्ग दिखाइए।”
यमराज की गूंजती आवाज़ उठी—
“मनुष्य! तू जानता भी है कि क्या माँग रहा है? किसी साधु का शाप देवताओं तक को बाँध देता है। उसे तोड़ना आसान नहीं। यदि तू असफल हुआ, तो तेरी आत्मा भी कभी मुक्ति न पाएगी।”
अभय ने दृढ़ स्वर में कहा—
“प्रभु, यदि मेरा प्रयास व्यर्थ भी हो जाए, तो भी मैं उन मासूम आत्माओं की पीड़ा देखते हुए चुप नहीं बैठ सकता।”
यमराज के नेत्रों में क्षणभर के लिए कोमलता झलकी।
“ठीक है। परंतु मार्ग सरल नहीं। तुझे तीन अंतिम परीक्षाएँ देनी होंगी। इन्हें पार कर ले तो न केवल शाप टूटेगा, बल्कि तेरा नाम युगों-युगों तक अमर होगा।”
पहली अंतिम परीक्षा – सत्य का दर्पण
यमराज ने इशारा किया। सामने एक विशाल दर्पण प्रकट हुआ। उसमें अभय की परछाई नहीं, बल्कि उसका जीवन दिखाई दे रहा था—
बचपन की गलतियाँ
दूसरों को दिया गया दर्द
अपने स्वार्थ के क्षण
दर्पण से आवाज़ आई—
“स्वयं को पहचान। यदि तू अपनी कमियों को स्वीकार न कर पाया, तो यहीं बिखर जाएगा।”
अभय की आँखों से आँसू बह निकले। उसने हाथ जोड़कर कहा—
“हाँ, मैंने गलतियाँ कीं। कई बार मैं स्वार्थी रहा। पर आज मैं उन्हीं पापों का प्रायश्चित कर रहा हूँ। मैं सत्य को स्वीकार करता हूँ।”
ज्यों ही उसने स्वीकार किया, दर्पण चकनाचूर हो गया और मार्ग खुल गया।
दूसरी अंतिम परीक्षा – समय की नदी
अब वह एक नदी के किनारे पहुँचा। यह साधारण नदी नहीं थी, बल्कि काल-नदी थी, जिसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य की धारा बह रही थी।
एक नाव प्रकट हुई। नाविक ने कहा—
“यदि तू इस नदी को पार करना चाहता है, तो अपने भविष्य का सामना कर। जो दृश्य देखेगा, उससे भयभीत न होना।”
नाव जैसे ही बीच पहुँची, नदी की लहरों में दृश्य उभरने लगे—
भविष्य में नगर फिर से फल-फूल रहा था।
लोग अभय का नाम भक्ति से ले रहे थे।
पर एक दृश्य ऐसा भी था जहाँ अभय अकेला, वृद्ध और निर्धन दिख रहा था।
क्षणभर को उसका मन डगमगाया—
“क्या यह मेरा अंत होगा?”
नाविक बोला—
“भविष्य पत्थर पर लिखी लकीर नहीं है। यह तेरे कर्मों पर निर्भर है। यदि तू धर्म पर अटल रहा, तो तेरा अंत भी पुण्य होगा।”
अभय ने साहस बटोरा और बोला—
“चाहे मेरा जीवन जैसा भी हो, मैं सत्य और धर्म का मार्ग कभी नहीं छोड़ूँगा।”
नदी शांत हो गई और नाव दूसरी ओर पहुँच गई।
तीसरी अंतिम परीक्षा – मृत्यु से सामना
अब वह एक विशाल कक्ष में पहुँचा। वहाँ एक काला सिंहासन था और उस पर उसकी ही परछाई बैठी थी—
वही चेहरा
वही आँखें
परंतु चेहरे पर घमंड और क्रूरता
परछाई ने हँसते हुए कहा—
“मैं तेरा अहंकार हूँ। जब तक तू मुझे पराजित नहीं करता, नगर का शाप नहीं टूट सकता।”
अभय ने मंत्रजप शुरू किया, पर अहंकार ने उसका स्वर दबा दिया। उसने कहा—
“तू क्यों दूसरों के लिए अपना जीवन जोखिम में डाल रहा है? तू भी सुख-सुविधाओं का अधिकारी है। यह नगर और इसकी आत्माएँ तेरी जिम्मेदारी नहीं।”
क्षणभर के लिए अभय चुप हो गया। पर फिर उसने आँखें बंद कर लीं और बोला—
“हाँ, शायद यह मेरी जिम्मेदारी नहीं। पर यदि मैं सत्य जानकर भी चुप रहा, तो मैं भी अधर्मी कहलाऊँगा। मैं अपने स्वार्थ के लिए नहीं, दूसरों के लिए जीना चाहता हूँ।”
जैसे ही उसने यह कहा, उसकी परछाई धुएँ में विलीन हो गई।
शाप का अंत
यमराज प्रकट हुए और बोले—
“अभय, तूने सत्य, समय और अहंकार की परीक्षाएँ पार कर लीं। तेरी भक्ति और साहस ने तुझे योग्य सिद्ध किया है। अब यह नगर शाप से मुक्त होगा।”
यमराज ने अपने दंड से भूमि पर प्रहार किया। अचानक पूरा महल, गलियाँ और नगर प्रकाश से भर गए। वर्षों से तड़पती आत्माएँ प्रकाश में समा गईं और मुक्त हो गईं।
त्रिकाल साधु की आत्मा भी प्रकट हुई। उसकी आँखों में अब क्रोध नहीं, केवल शांति थी।
“बेटा, तूने वह कर दिखाया जो मैं भी न कर सका। आज से तू नगर का मुक्तिदाता कहलाएगा।”
साधु की आत्मा आकाश में विलीन हो गई।
नगर का पुनर्जन्म
सुबह की पहली किरण के साथ नगर जाग उठा। लोगों ने देखा कि जहाँ पहले वीरानी और भय था, वहाँ अब जीवन और शांति थी। बच्चे खेल रहे थे, पक्षी चहचहा रहे थे।
अभय थका हुआ था, पर उसके चेहरे पर संतोष की मुस्कान थी। नगरवासियों ने उसे घेर लिया और कहा—
“आज से तुम हमारे रक्षक हो। यह नगर तुम्हें सदा याद रखेगा।”
अभय ने हाथ जोड़कर कहा—
“मैंने कुछ नहीं किया, सब ईश्वर की कृपा है। याद रखना, जब तक हम सत्य और धर्म के मार्ग पर रहेंगे, कोई शाप हमें छू भी नहीं पाएगा।”
कहानी का संदेश
सच्चा साहस अपने भीतर के भय और अहंकार को हराने में है।
शाप और बाधाएँ केवल बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर भी होती हैं।
जब तक हम सत्य, भक्ति और धर्म पर अडिग रहते हैं, तब तक कोई अंधकार स्थायी नहीं हो सकता।
👉 इस प्रकार यह रहस्यमयी, भक्तिमय और रोमांचक कथा यहाँ समाप्त होती है।
FAQ (Frequently Asked Questions)
1. त्रिकाल साधु कौन थे?
त्रिकाल साधु एक रहस्यमयी तपस्वी थे, जिन्होंने अपने तप और संकल्प से भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों को जानने की शक्ति प्राप्त की थी। कहानी में वे नगर के राजा के अधर्म से क्रोधित होकर शाप देते हैं।
2. कहानी का मुख्य संदेश क्या है?
इस कहानी का मुख्य संदेश है कि असली शत्रु बाहर नहीं बल्कि भीतर का अहंकार, भय और मोह है। जब इंसान अपने भीतर के दोषों पर विजय पा लेता है, तभी सच्ची मुक्ति मिलती है।
3. अभय कौन था और उसकी भूमिका क्या थी?
अभय एक साहसी युवक था, जिसने नगर की आत्माओं को मुक्त करने का संकल्प लिया। उसने मृत्यु-द्वार की कठिन यात्राएँ और परीक्षाएँ पार कर नगर को शाप से मुक्त किया।
4. मृत्यु-द्वार का क्या महत्व है?
मृत्यु-द्वार इस बात का प्रतीक है कि हर इंसान को जीवन और मृत्यु की सच्चाई का सामना करना पड़ता है। यह आत्मा की परख का स्थल है, जहाँ केवल सच्चे और अहंकार-रहित साधक ही प्रवेश कर सकते हैं।
5. इस कहानी को पढ़ने से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
यह कहानी हमें प्रेरित करती है कि हमें जीवन में कभी भी धर्म और सत्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, साहस और भक्ति से हर अंधकार मिटाया जा सकता है।
6. क्या यह कहानी पौराणिक ग्रंथों पर आधारित है?
यह कहानी पुराणों और भारतीय आध्यात्मिक कथाओं की शैली में लिखी गई है, लेकिन यह एक ओरिजिनल और कल्पनाशील रचना है। इसमें पौराणिक तत्वों का प्रयोग केवल प्रेरणा के रूप में किया गया है।
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त्रिकाल साधु और मृत्यु का द्वार | भक्तिमय रहस्यमयी कथा
✅ Focus Keywords
त्रिकाल साधु की कहानी
मृत्यु-द्वार रहस्य कथा
भक्तिमय रहस्यमयी कहानी
आत्मा की मुक्ति की कथा
रोमांचक हिंदी कहानी
पौराणिक रहस्य कथा हिंदी में
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