🌸 ब्रह्माण्ड पुराण की कहानी – देवी भागवत और शक्ति की महिमा
: असुरों का आतंक और देवताओं की व्यथा
प्राचीन समय में, जब धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष लगातार चलता रहता था, तब एक समय ऐसा आया जब असुरों ने अत्यधिक शक्ति प्राप्त कर ली।
उनमें सबसे भयानक असुर था – शुम्भ और निशुम्भ।
ये दोनों असुर ब्रह्मा जी की घोर तपस्या करके अमरत्व का वरदान प्राप्त कर चुके थे। उन्हें वरदान मिला था कि उनका वध किसी पुरुष द्वारा नहीं होगा, केवल स्त्री ही उन्हें मार सकेगी।
यह सुनकर दोनों असुर हँस पड़े –
“स्त्रियाँ कोमल और दुर्बल होती हैं। हमारे लिए वे कोई खतरा नहीं।”
वरदान पाकर वे और भी क्रूर बन गए।
उन्होंने इंद्रलोक पर आक्रमण किया।
देवताओं को परास्त कर दिया।
स्वर्ग की अप्सराओं तक को अपने वश में कर लिया।
यज्ञ-वेदियाँ तोड़ी जाने लगीं और ऋषियों की तपस्या भंग होने लगी।
देवता भयभीत होकर भगवान विष्णु और महादेव के पास पहुँचे।
देवताओं ने कहा –
“प्रभु! हम असहाय हो चुके हैं। ये असुर अजेय प्रतीत होते हैं। हमारी रक्षा कौन करेगा?”
महादेव ने शांत स्वर में उत्तर दिया –
“इस बार धर्म की रक्षा महाशक्ति करेंगी। वही शक्ति हैं जो संपूर्ण ब्रह्मांड की आधार हैं। उनका स्मरण करो।”
देवताओं की प्रार्थना
सभी देवताओं ने हिमालय की गुफाओं में जाकर स्तुति की। उन्होंने कहा –
“हे जगदंबा! आप ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश की जननी हैं। आप बिना रूप के भी रूपधारिणी हैं। हमें असुरों से रक्षा प्रदान करें।”
उनकी प्रार्थना सुनकर आकाश में दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ।
उस प्रकाश से एक अलौकिक रूप प्रकट हुआ –
महामाया, आदिशक्ति, दुर्गा माता।
उनका स्वरूप भव्य था –
दस भुजाओं में शस्त्र धारण किए हुए,
सिंह पर आरूढ़,
नेत्रों से तेजस्विता प्रकट हो रही थी।
देवताओं ने उन्हें प्रणाम किया।
माँ दुर्गा ने कहा –
“देवताओं! चिंता मत करो। अधर्म का अंत निश्चित है। मैं शीघ्र ही उन असुरों का वध करूँगी।”
पार्ट 2 : देवी का युद्ध और चंड-मुंड वध
जब शुम्भ-निशुम्भ को पता चला कि एक देवी ने प्रकट होकर देवताओं का साथ दिया है, तो वे क्रोधित हो उठे।
उन्होंने अपने दूत भेजकर कहा –
“हे देवी! हम संसार के स्वामी हैं। तुम अत्यंत सुंदर हो, इसलिए हमारे साथ चलो और हमारी रानी बनो।”
देवी मुस्कराई और बोलीं –
“यदि तुम मुझे जीत सकते हो, तो मैं तुम्हारे साथ चलूँगी। परंतु युद्ध में पराजित कर सको, तभी मुझे पाने का अधिकार होगा।”
यह सुनकर असुर हँस पड़े और अपनी विशाल सेना लेकर युद्धभूमि में आ पहुँचे।
चंड और मुंड का वध
सबसे पहले दो असुर – चंड और मुंड – सेना लेकर आए।
उन्होंने देवी को घेर लिया और गरजते हुए कहा –
“स्त्री होकर युद्ध करेगी? हम तुझे अभी बंदी बना लेंगे।”
देवी ने अपने कपाल से कालिका को प्रकट किया। उनका रूप भयानक था – काले वर्ण की, हाथ में तलवार, और जिव्हा बाहर निकली हुई।
कालिका ने चंड और मुंड को युद्ध में मार डाला और उनका सिर माँ दुर्गा के चरणों में लाकर रखा।
देवी ने प्रसन्न होकर कहा –
“तुम्हें अब से ‘चामुंडा’ नाम से जाना जाएगा।”
रक्तबीज का आतंक
इसके बाद एक और भयानक असुर आया – रक्तबीज।
उसकी विशेषता थी कि उसके शरीर से जब भी रक्त की बूँद गिरती, वहाँ से एक और असुर उत्पन्न हो जाता।
देवताओं की सेना घबराने लगी। जैसे ही रक्तबीज घायल होता, वैसे ही उसकी संख्या और बढ़ जाती।
माँ दुर्गा ने तुरंत काली को आदेश दिया –
“रक्तबीज का रक्त धरती पर नहीं गिरना चाहिए। तुम अपना जिह्वा फैलाकर उसका रक्त पी जाओ।”
काली ने वैसा ही किया। उन्होंने युद्धभूमि में चारों ओर अपनी जिह्वा फैला दी और जैसे ही रक्तबीज के घाव से रक्त टपकता, उसे पी जातीं।
अंततः रक्तबीज का वध हो गया।
पार्ट 3 : शुम्भ-निशुम्भ का वध और देवी की महिमा
अब केवल शुम्भ और निशुम्भ शेष बचे थे।
वे दोनों अत्यंत क्रोधित होकर स्वयं युद्धभूमि में आए।
निशुम्भ ने गरजते हुए कहा –
“देवी! तुम स्त्री होकर हमें ललकारती हो? आज तुम्हारा अंत होगा।”
देवी ने शांत स्वर में उत्तर दिया –
“मैं ही ब्रह्मांड की आदिशक्ति हूँ। मैं ही सृष्टि की रचना और संहार करने वाली हूँ। तुम्हारा अंत निश्चित है।”
भीषण युद्ध
निशुम्भ ने देवी पर असंख्य बाण छोड़े, लेकिन वे सब व्यर्थ हो गए।
देवी ने त्रिशूल से वार किया और निशुम्भ का अंत कर दिया।
शुम्भ ने देखा कि उसका भाई मारा गया, तो वह और भी क्रोधित हुआ।
शुम्भ ने कहा –
“हे देवी! तुम अकेली नहीं हो, तुम्हारे साथ ये सब शक्तियाँ हैं।”
देवी ने उत्तर दिया –
“ये सब मेरी ही शक्तियाँ हैं। मैं अकेली ही सम्पूर्ण हूँ।”
यह कहकर देवी की सारी सहायिनी शक्तियाँ उनके भीतर समा गईं और वे एकमात्र भव्य रूप में प्रकट हुईं।
शुम्भ का वध
अब देवी और शुम्भ के बीच भीषण युद्ध हुआ।
शुम्भ कभी आकाश में छलाँग लगाता, कभी धरती को हिलाता।
लेकिन देवी ने अपने दिव्य त्रिशूल से एक ही प्रहार में उसका वध कर दिया।
तीनों लोकों में “जय देवी माँ! जय आदिशक्ति!” का घोष हुआ।
✨ कहानी का संदेश
अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है।
स्त्री केवल कोमलता की प्रतिमा नहीं, बल्कि शक्ति और साहस का रूप भी है।
देवी दुर्गा का स्मरण करने से भय और संकट दूर होते हैं।
ब्रह्माण्ड पुराण यह सिखाता है कि संपूर्ण जगत् शक्ति के बिना अधूरा है।
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