भस्मासुर और भगवान शिव का चमत्कार
भगवान शिव और भस्मासुर की अनसुनी चमत्कारिक कथा
प्रस्तावना
भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म में भगवान शिव को भोलेनाथ, महादेव और देवों के देव के रूप में जाना जाता है। वे केवल विनाशक नहीं, बल्कि करुणा, प्रेम और भक्ति के प्रतीक हैं। उनकी कहानियाँ न केवल धार्मिक महत्व रखती हैं, बल्कि जीवन जीने की राह भी दिखाती हैं।
इन्हीं कहानियों में एक कथा है – भस्मासुर और भगवान शिव की चमत्कारिक कथा। यह कथा हमें यह सिखाती है कि शक्ति का दुरुपयोग विनाश का कारण बनता है, और अहंकार अंततः स्वयं का ही सर्वनाश करता है।
भस्मासुर का जन्म और तपस्या
एक समय की बात है, दैत्य कुल में एक असुर का जन्म हुआ, जिसका नाम था भस्मासुर। उसका मन बचपन से ही सामर्थ्य और शक्ति प्राप्त करने की ओर आकर्षित था। वह यह चाहता था कि पूरी सृष्टि में उससे बड़ा कोई न हो।
धीरे-धीरे उसमें तपस्या करने की भावना जगी। उसने निश्चय किया कि वह स्वयं भगवान शिव को प्रसन्न करेगा और उनसे ऐसा वरदान मांगेगा, जिससे वह अपराजित बन जाए।
भस्मासुर ने हिमालय की गुफाओं में जाकर घोर तपस्या आरंभ की। उसने भोजन-पानी त्याग दिया और केवल शिव का नाम जपते हुए ध्यान करने लगा। वर्षों की कठिन साधना के बाद भगवान शिव उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उसके सामने प्रकट हुए।
शिव का वरदान
भगवान शिव ने प्रकट होकर कहा –
“वत्स! तुम्हारी तपस्या ने मुझे प्रसन्न कर दिया है। मांगो, जो भी वरदान चाहो।”
भस्मासुर ने हाथ जोड़कर कहा –
“हे महादेव! मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मैं अपने हाथ को किसी भी प्राणी के सिर पर रखूँ और वह तुरंत भस्म हो जाए।”
भोलेनाथ भोले स्वभाव के कारण बिना विचारे ही “तथास्तु” कह बैठे।
वरदान का दुरुपयोग
वरदान मिलते ही भस्मासुर का अहंकार बढ़ गया। उसने सोचा –
“अब मैं पूरी सृष्टि का स्वामी बन सकता हूँ। देवता, ऋषि-मुनि और मनुष्य सभी मेरे सामने तुच्छ हैं।”
उसने अपनी शक्ति को आज़माने के लिए कई जीव-जंतुओं और साधुओं पर हाथ रखा और वे तुरंत भस्म हो गए। धीरे-धीरे उसका आतंक बढ़ने लगा।
देवता भी उसके डर से कांपने लगे। इन्द्रदेव, वरुण, अग्नि और वायु तक उसके सामने टिक नहीं पाए। अब भस्मासुर के मन में एक और खतरनाक विचार आया –
“क्यों न इस शक्ति को स्वयं भगवान शिव पर ही आज़माया जाए? यदि शिव ही नहीं रहेंगे, तो मैं संपूर्ण ब्रह्मांड का स्वामी बन जाऊँगा।”
शिव की कठिनाई
भस्मासुर ने महादेव का पीछा करना शुरू कर दिया। वह शिवजी को पकड़कर उनके सिर पर हाथ रखना चाहता था। यदि ऐसा हो जाता, तो स्वयं भगवान शिव भी भस्म हो जाते।
भोलेनाथ संकट में पड़ गए। वे दया के सागर थे, लेकिन अपनी ही दी हुई शक्ति अब उनके लिए खतरा बन चुकी थी।
वे इधर-उधर भागने लगे, पहाड़ों और जंगलों में छिपने लगे।
यह दृश्य देखकर सभी देवता भयभीत हो गए। तब सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे कुछ करें और शिवजी को इस संकट से मुक्ति दिलाएँ।
विष्णु का मोहिनी रूप
भगवान विष्णु ने देखा कि भस्मासुर अहंकार में अंधा हो चुका है। उन्होंने यह भी समझा कि केवल शक्ति से उसे हराना संभव नहीं है, बल्कि उसके अहंकार को उसके ही खिलाफ मोड़ना होगा।
इसलिए भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया। मोहिनी रूप में वे अत्यंत सुंदर और आकर्षक देवी के रूप में भस्मासुर के सामने प्रकट हुए।
भस्मासुर मोहिनी की सुंदरता देखकर मोहित हो गया। उसके मन में वासना और आकर्षण जाग उठा।
मोहिनी ने मुस्कुराकर कहा –
“हे भस्मासुर! यदि तुम मुझे पत्नी बनाना चाहते हो, तो पहले मेरे साथ नृत्य करो। जो-जो मुद्राएँ मैं करूँगी, वही मुद्राएँ तुम्हें भी करनी होंगी। तभी मैं तुम्हें स्वीकार करूंगी।”
भस्मासुर का विनाश
भस्मासुर इस प्रस्ताव पर तुरंत तैयार हो गया। उसने नृत्य शुरू कर दिया और मोहिनी के प्रत्येक भाव और मुद्रा की नकल करने लगा।
नृत्य के दौरान मोहिनी ने चतुराई से अपने हाथ को अपने सिर पर रखा। भस्मासुर ने भी वैसा ही किया।
जैसे ही उसका हाथ उसके सिर पर पड़ा, भगवान शिव के दिए वरदान के अनुसार वह स्वयं भस्म हो गया।
शिव का चमत्कार और शिक्षा
इस प्रकार भगवान शिव एक बड़े संकट से मुक्त हुए। देवताओं ने राहत की सांस ली और भगवान विष्णु को धन्यवाद दिया।
इस घटना से यह शिक्षा मिलती है कि –
शक्ति का उपयोग सदैव धर्म और भलाई के लिए होना चाहिए।
अहंकार और लालच मनुष्य का सर्वनाश कर देते हैं।
भगवान शिव भोलेनाथ अवश्य हैं, लेकिन अंततः अधर्म का नाश निश्चित है।
भस्मासुर कथा का गूढ़ रहस्य
यह कथा केवल एक पौराणिक घटना नहीं है, बल्कि इसमें गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा है।
भस्मासुर मानव के भीतर के अहंकार और वासना का प्रतीक है।
भोलेनाथ का वरदान यह दर्शाता है कि जब मनुष्य बिना सोचे-समझे अपनी शक्तियों का प्रयोग करता है, तो वही शक्ति उसके विनाश का कारण बनती है।
विष्णु का मोहिनी रूप हमें यह सिखाता है कि अहंकार को केवल चतुराई और विवेक से ही हराया जा सकता है।
निष्कर्ष
भगवान शिव और भस्मासुर की यह अनसुनी चमत्कारिक कथा हमें बताती है कि ईश्वर अपने भक्तों को कभी अकेला नहीं छोड़ते। संकट चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, अंत में धर्म और सत्य की ही विजय होती है।
आज भी यह कहानी हर युग में प्रासंगिक है। यह हमें सावधान करती है कि शक्ति, पद और सामर्थ्य कभी भी हमारे भीतर अहंकार पैदा न करें। क्योंकि अहंकार का अंत सदैव विनाश ही होता है।
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